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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 19–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verses 19–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 19-21

संस्कृत श्लोक

कचनैकात्मिकैषा चिद्यथा कचति यादृशम् । तथा तथाशु भवति तत्स्वभावैककारणात् ॥ १९ ॥ निमेषे यदि कल्पौघसंविदं परिविन्दति । निमेष एव तत्कल्पो भवत्यत्र न संशयः ॥ २० ॥ कल्पे यदि निमेषत्वं वेत्ति कल्पोऽप्यसौ ततः । निमेषीभवति क्षिप्रं तादृग्रूपात्मिका हि चित् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

चिति का स्फुरण स्वभाव है, जैसे और जिस रूप में उसका स्फुरण होता है, वह शीघ्र उसी रूप में हो जाती है, क्योंकि वैसा होने में उसका स्फुरणस्वभाव होना ही एकमात्र कारण है। भाव यह कि चित्‌ स्फुरणस्वभाव ही है, उसके पदार्थविशेषाकार होने में द्रष्टा का संस्कार कारण है। यों एक ही संवित्‌ में किसीका संस्कार के अनुसार क्षण का आरोप होता है और किसीका कल्प आदिका आरोप होता है, इस प्रकार कोड विरोध नहीं है यदि किसी पुरूष को एक क्षण में सैकड़ों कल्पो की प्रतीति होती है, तो क्षण ही उसके लिए कल्प होता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । यदि किसीको कल्प में निमेषता का ज्ञान हो जाता है, तो कल्प ही उसके लिए निमेष बन जाता है, क्‍योंकि चित्‌ स्फुरणरूपा है