Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 41–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verses 41–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 41-43
संस्कृत श्लोक
वासन्तः संस्थितो भूमौ तथा सर्गः परे पदे ।
यथा द्रवत्वं कनके स्थितमन्तरनुन्मिषत् ॥ ४१ ॥
तथा स्थितः परे सर्ग आत्मवर्गादणावणौ ।
संनिवेशो यथाङ्गानामङ्गिनोऽनन्य आत्मनः ॥ ४२ ॥
जगदेवमनङ्गस्य स्वात्मनो ब्रह्मणस्तथा ।
यादृगेकनरः स्वप्ने युद्धमन्यं नरं प्रति ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सोने के अन्दर द्रवत्व विद्यमान
है, पर लोगों को दृष्टिगोचर नहीं होता, अग्नि का संयोग होने पर प्रकट हो जाता है, वैसे
ही अत्यन्त सूक्ष्म परम पद में यह सृष्टि स्थित हे । प्राणियों को उनके कर्मोका फलभोग कराना
ही उसका प्रयोजन है, जब प्राणियों का भोगजनक अदृष्ट उदित होता है, तब यह सृष्टि
प्रादुर्भूत हो जाती है । जैसे अंगो का (अवयवो का) गठन आत्मरूप अंगी से अभिन्न है यानी
अंगों की अंगी से पृथक् सत्ता नहीं हे, वैसे ही आत्मरूप अखण्ड ब्रह्म से यह जगत् भी अनन्य
(अभिन्न) हे जैसे स्वप्न में किसी आदमी का किसी दूसरे आदमी के साथ युद्ध हुआ | स्वप्न
काल में स्वप्न देखनेवाले के प्रति सद्रूप और अन्य के प्रति असद्रूप भी वह युद्ध स्वप्नद्रष्टा
का आत्मा ही है, उससे अतिरिक्त नहीं है, वैसे ही मायाकाश में स्थित आत्मरूप यह जगत्
भी मायिक दृष्टि से सत् होता हुआ भी तात्त्विक दृष्टि से असत् ही हे