Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
तादृशो ब्रह्मणः स्वर्गो बुद्ध एव सुषुप्तवत् ।
तृणगुल्मलतायुक्तः शिशिरान्ते यथा रसः ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे शिशिर ऋतु के अन्त में (वृक्ष आदि के पत्र गिरने के
समय) आगे वसन्त में पत्र, पुष्प आदि के रूप मे होनेवाले तिनके, पत्ते, आडी, लता आदि
से युक्त रस अपनी उपादानभूत भूमि में स्थित होता है, वैसे ही परम पद में यानी
सच्चिदानन्दघन परब्रह्म में यह सृष्टि स्थित हे