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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

संविद्यथा या यतते तथा सैव व्यवस्थिता । विसृष्टा सृष्टिविन्नद्यां यावद्यत्नान्न रोधिता ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि जैसे ओलों की कठिनता प्रयत्न के बिना ही शान्त हो जाती है, वैसे ही प्रयत्न के बिना ही दृश्य का विनाश क्यों नहीं होता ? इस पर कहते हैं। सृष्टिवेत्ता (सृष्टिकर्ता) ब्रह्मचैतन्यरूप नदी में उसकी एक भागरूप जो जीव संवित्‌ है, वह जिस प्रकार की प्रवृत्ति के प्रवाह से जिस तरह के कार्यकारणफलभाव के लिए प्रयत्न करती है, वैसे कार्यकारण के फलभाव से छोड़ी गई वह अपने प्रयत्न के अनुसार वैसे ही व्यवस्थित होती है, जब तक उससे विरुद्ध निवृत्ति प्रयत्न से वह रोकी नहीं जाती, तब तक निवृत्त नहीं होती है