Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
चिदाकाशावभासोऽयं जगदित्यवबुध्यते ।
चिद्व्योम्न्येवात्मनि स्वच्छे परमाणुकणं प्रति ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि इस जगत् की रचना ब्रह्माजी ने की है, जीव की क्या ताकत कि
इसे रोक दे, महाराजाधिराज ने जिस कार्य के लिए आज्ञा दे दी हो, भला वह साधारण आदमी
के यत्न से रोकी जा सकती है ? इस पर कहते हैं।
यद्यपि चिदाकाशरूप स्वच्छ ब्रह्म में चिदाकाश का जो मायिक अवभास है, वही जगत्रूप
से प्रतीत होता है, इसलिए जगत् ब्रह्म से रचा गया है, तथापि वह जगत् जिसका ब्रह्मभाव
अपरिच्छिन्न है, उस पुरुष के प्रति वैसा प्रतीत नहीं होता, किन्तु बुद्धि आदि परिच्छिन्न
उपाधियों के कारण अत्यन्त परिच्छिन्न जीव के प्रति ही वह वैसा प्रतीत होता है, क्योकि
उसके प्रयत्नों से उत्पन्न कर्मफलों के भोग के लिए ही वह ब्रह्म मेँ कल्पित है ओर जब उसके
प्रयत्न से बोध होता है, तब दृश्य का परिमार्जन अवश्य होता ही है