Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
तीव्रवेगवती या स्यात्तत्र संविदकम्पिता ।
सैवायाति परं स्थैर्यमामोक्षं त्वेकरूपिणी ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी अवस्था में बिम्ब के रहते प्रतिबिम्ब हटाया नहीं जा सकता, फिर निर्विकल्पतारूप
मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी, ऐसी आशंका कर कहते हैं।
पूर्वोक्त जीवसंविदों में जो ही जीवसंवित् यानी ब्रह्माकारवृत्ति तीव्र वेगवाली और विषयदोष
से अविचलित होकर मोक्षपर्यन्त एक रूपवाली होती है, वही सर्वोत्कृष्ट परमस्थिरतारूप
(ब्रह्मरूप से स्थिरत्वरूप) मोक्ष को प्राप्त होती है अन्य नहीं