Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 51–52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verses 51–52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 51,52
संस्कृत श्लोक
अहमेवं कुलाचारे राजा स्यामेवमित्यपि ।
विदूरथविदो रत्नादुदिता प्रतिभा यथा ॥ ५१ ॥
यावन्तो जन्तवो यस्मिन्ये ये सर्गे यदा यदा ।
ते सर्वगत्वाच्चिद्धातोरन्योन्यादर्शतां गताः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले तदनुकूल संकल्पवैचित्र्य की उत्पत्ति भी पूर्वोक्त रीति से ही होती है, ऐसा कहते हैं ।
मैं इस प्रकार के कुलाचार में इस प्रकार का राजा होऊँ, यह जैसे चिन्तामणि से कान्ति
स्वतः निकलती है, वैसे ही विदूरथरूपी जीव चैतन्य से मनोरथ उत्पन्न हुआ । जिस जिस
सृष्टि में जब जब जो जो और जितने जीव हुए होंगे और हैं, वे सब चेतन के सर्वव्यापक होने के
कारण अन्योन्य के लिए दर्पणरूप हो गये । भाव यह है कि जैसे दर्पण एक दूसरे के अन्दर पड़े
हुए प्रतिबिम्बों को ग्रहण कर लेते हैं, वैसे ही अनेक जीवचैतन्यो में समान विषय के आरोपक्रम
से परस्पर के अन्तर्गत प्रतिबिम्बग्राहकता आ जाती है