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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

कचने चित्स्वभावस्य न च कारणमार्गणम् । युक्तं महामणेर्भासामिवान्यत्र स्वभावतः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि चित्‌ तो उदासीन है। उसके अध्यस्त पदार्थ प्रतीतिरूप स्फुरणे क्या हेतु है, तो यह शंका ठीक नहीं है, क्योकि उसमें स्फुरण स्वाभाविक है, जिनका स्फुरण स्वाभाविक नहीं है, उन्हीं विषयों के स्फुरण में हेतु का अन्वेषण ठीक है । जैसे उदासीन चिन्तामणि के प्रकाशो के प्रसार में हेतु की अपेक्षा नहीं है, किन्तु उससे विभिन्न पदार्थों को उत्पन्न करने में ध्यान करनेवाले लोगों के मनोरथ की विचित्रता की अपेक्षा है, वैसे ही यहाँ भी है, ऐसा कहते हैं । चित्‌ के स्फुरण के लिए हेतु खोजने की जरूरत नहीं है, क्योकि वह स्वभावतः होता है, जैसे महामणि से (चिन्तामणि से) कान्तियों का प्रसार अपने आप होता है, वैसे ही चित्‌ का स्फुरण भी स्वतः होता है । जिन वस्तुओं का स्फुरण स्वतः नहीं होता जैसे कि चिन्तामणि से विविध विचित्र पदार्थो की प्राप्ति। उसमें प्रार्थी लोगों के विचित्र मनोरथो की अपेक्षा होती है यानी चित्‌ के स्फुरण में कोई कारण नहीं है, किन्तु विचित्र पदार्थो के रूप से स्फुरण में जीवों का अदृष्ट कारण है