Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
तत्रातियत्नाज्जयति सत्याः संविद आत्मसात् ।
कुर्वन्ति सरिदम्भोधिगामिनी सरितो यथा ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि यदि ऐसी बात है, तो जगत् के प्रति आकर्षण चिरकाल से
अभ्यस्त है, उसीमें तीव्र वेग होगा, ऐसी स्थिति में मोक्ष के प्रति आशा दुराशा ही हो
जायेगी, इस पर कहते हैं ।
यह व्यवहार में सभीको अनुभूत है कि जो वेग किसी प्रकार के प्रयत्न के बिना उत्पन्न
होता है, उसकी अपेक्षा प्रयत्न से उत्पन्न होनेवाला वेग प्रबल होता है, इसलिए प्रयत्न से
संपादित ब्रह्माकार वेग ही जगदाकार चिद्धिलास पर विजय पाता है । सत्यसंविद् और
असत्यसंविद्-इन दोनों में सत्यंसंवितों में ही प्रबलता दिखाई देती है, अत: ब्रह्माकार संवित्
ही जगदाकार वेग को ग्रहण कर लेती है, जैसे सागरगामिनी महानदी अपनी सहायक छोटी-
मोटी नदियों को अपने अधीन कर लेती है, वैसे ही यहाँ पर भी समझना चाहिए