Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
ये समास्तत्र ते तावद्यतन्ते चित्स्वभावतः ।
यावदेको जयत्यत्र द्वितीयः स निमज्जति ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि भले ही ब्रह्माकार संवित् की, अतिवेगवत्ता होने से, विजय हो, लेकिन
जब मन्द अधिकार और मध्य अधिकारवश चित्त स्थिर न होने से बीच-बीच में ब्रह्माकारता
और विषयाकारता का उदय होगा, तब दोनों के समबल होने से किसीकी भी जयपराजय की
आशा नहीं करनी चाहिए, इस पर कहते हैं।
जो अधिकारी उक्त दोनों आकारों में समानवेगवाले हैं, वे भी दोनों आकारों में सदा
समानवेगवाले नहीं रह सकते, किन्तु इन दोनों आकारों में जब एक यानी ब्रह्माकार स्थिर
होकर उत्कर्ष को प्राप्त होता है और दूसरा बाह्याकार विलीन हो जाता है, तब वे लोग श्रवण
आदि की आवृत्तिरुप प्रयत्न करते हैँ । तब उन्हें भी क्रमश: अभ्यास बढ़ने से ब्रह्माकार में तीव्र
वेग का उदय होने एवं विषयाकार के विलीन होने से अन्य का विजय सिद्ध हो जाता है