Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
तत्कालमेष शब्दाणुश्चिच्चमत्काररूपधृक् ।
चेतते खमिवैवान्तः संकल्प इव चेतसा ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी समय अपने कारण में लीन हुए शब्दतन्मात्रा का आकाशरूप से आविभवि होता है।
यह शब्दतन्मात्रा, जो पहले अपने कारण में लीन थी, सर्वशक्तिमती माया से संवलित
ब्रह्मरूप को धारण कर चित्त से अन्तःकरण में उसी क्षण में संकल्प के समान चिद्रूप आकाश
के तुल्य स्फुरित होती है, वही आकाश की उत्पत्ति है