Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
चिद्रूपेण स्वसंवित्त्या स्वचिन्मात्रं विभाव्यते ।
स्वमेव रूपहृदयं वातेन स्पन्दनं यथा ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
द्रष्टि-सृष्टिवाद के उपपादनक्रम से भी जगत् की चित् से अभिन्नता का अनुभव
श्रीवसिष्टजी करा रहे हैं यद्यपि चैतन्य निष्क्रिय (व्यापारशून्य) है, तथापि अविद्या में उसके
प्रतिबिम्बित होने से वह अन्यथा अपनी कल्पना करता है, ऐसा कहते हैं।
परमार्थ चिद्रूप ब्रह्म, दर्पण में आँखों का प्रतिघात होने से अपने मुंह की नाई, अविद्या में
प्रतिबिम्बित अपनी संवित् से अपने चिन्मात्रस्वरूप प्रपंच के रहस्यभूत अज्ञानावृत अपने स्वरूप
की ही ऐसी कल्पना करता है, जैसे कि वायु अपने में स्पन्द की कल्पना करता हे