Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
न सर्गे तिष्ठति परं सर्गस्तिष्ठति नो परे ।
अवयवावयविवत्सत्तानवयवैस्तयोः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि किसीको यह जिज्ञासा हो कि जैसे विलीन तरगे महाजल मे अवयवरूप से रहती हैं
अथवा अवयवी समवायसम्बन्ध से अवयवो मे रहता है, वैसे ही बरह्म मे जगत् की स्थिति तो
नहीं है 2 इस पर कहते है ।
न तो सृष्टि में समवायसम्बन्ध से परब्रह्म रहता है और न सृष्टि ही अवयवरूप से परब्रह्म
में रहती है । वास्तव में अवयव ओर अवयवी में भी परस्पर की आधारता उत्पन्न नहीं होती हे ।
विचार कीजिए, अवयवा में समवायसम्बन्ध से रहता हुआ प्रत्येक अवयव में सर्वाश से रहता है
अथवा कुछ अवयवो को लेकर ? प्रथम पक्ष में प्रत्येक अवयव में अलग-अलग अनेक अवयवी
हो जायेंगे । ऐसी स्थिति में गाय के कान में भी सम्पूर्ण गाय रहेगी, अतः उसके दोहन आदि
कार्य होने लगेंगे और अवयवो का विश्लेषण होने पर भी अवयवी का जाति के समान नाश नहीं
होगा । दूसरे पक्ष मेँ अनवस्था से अनन्त अवयव होने के कारण मेरु और सरसों में साम्य हो
जायेगा । तात्पर्य यह है कि जब प्रत्येक अवयव में कुछ अवयवो को लेकर अवयवी रहता है,
ऐसा यदि माना जाय, तो जिन अवयवो को सद्भाव मानना पड़ेगा, फिर उन उन अवयवो में
भी मानना होगा, ऐसी स्थिति में अनवस्थित अनन्त अवयव मानने होगे, फलतः मेरु ओर
रसो में समान परिमाण की प्रसक्ति होगी, क्योकि दोनों के अवयव अनन्त हैँ । इसी प्रकार
अवयव भी अवयवी में क्या एक भाग में रहते हैं या सर्वाशमें ? पहले पक्ष मे अनवस्था दोष
होगा | द्वितीय पक्ष में अन्य अवयवो का समावेश न होने से तथा अद्वितीय ब्रह्म में अवयवो का
सम्बन्ध नहीं होने से सम्पूर्ण द्रव्यो की निरवयवत्वापत्ति हो जायेगी, इसलिए अवयव ओर
अवयवी की अनवयवों से ही यह सत्ता है, यह सिद्धान्त हे