Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
अन्यरूपा यथानन्या तेजस्यालोकतोदरे ।
तथा ब्रह्मणि विश्वश्रीः सत्यासत्यात्मिका चिति ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तेज के अन्दर आलोकता
(चमक) अनन्य (अभिन्न) होती हुई भी भिन्न प्रतीत होती है, वैसे ही चिद्घन ब्रह्म में
असत्यरूप विश्व की शोभा सत्य प्रतीत होती हे ।॥