Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verses 24–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verses 24–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 24,25
संस्कृत श्लोक
अनुत्कीर्णा यथा पङ्के पुत्रिका चाथ दारुणि ।
यथा वर्णा मषीकल्के तथा सर्गाः स्थिताः परे ॥ २४ ॥
अनन्यान्येव कचति ब्रह्मतत्त्वमरुस्थले ।
असत्यात्मनि सत्येव त्रिजगन्मृगतृष्णिका ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे खिलौना बनाने के लिए तैयार की
गई गीली मिट्टी मे न बनाये गये खिलौने रहते हैं, जैसे खिलौने बनाने के लिए प्रस्तुत काठ में
खिलौने स्थित हैं ओर जैसे स्याही के चूर्ण में अक्षर स्थित रहते हैं, वैसे ही परब्रह्म में सृष्टियाँ
स्थित हैँ । ब्रह्मतत्त्वरूप मरूभूमि में त्रिजगत्रूपी मृगतृष्णा यद्यपि असत्य है, फिर भी मायावश
सत्य-सी प्रतीत होती है यानी जैसे मरूभूमि में मृगतृष्णा अनन्य (अभिन्न) होती हुई भी
अन्य-सी स्फुरित होती है वैसे ही ब्रह्मतत्त्व मेँ असत्य भी यह त्रिजगत् सत्य प्रतीत होता
हे