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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verses 27–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verses 27–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 27-29

संस्कृत श्लोक

यथा क्षीरस्य माधुर्यं तीक्ष्णत्वं मरिचस्य च । द्रवत्वं पयसश्चैव स्पन्दनं पवनस्य च ॥ २७ ॥ स्थितोऽनन्यो यथान्यः सन्नास्ति तत्र तथात्मनि । सर्गो निर्गलचिद्रूपः परमात्मात्मरूपभृत् ॥ २८ ॥ कचनं ब्रह्मरत्नस्य जगदित्येव यत्स्थितम् । तदकारणकं यस्मात्तेन न व्यतिरिच्यते ॥ २९ ॥ वासना चित्तजीवादिवेदनं वेदनोदितम् । नोदेत्यवेदनादेव यतनादेव पौरुषात् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे दूध में मिठास, मिर्च में कड्वापन, पानी में तरलता (द्रवता) और वायु मेँ चलन अभिन्नरूप से रहता है, वैसे ही परमात्मा में यह असत्‌ विनाशिस्वरूप सर्ग चिद्रूप होकर स्थित है । यद्यपि यह परमात्मा से भिन्न नहीं है, तथापि अज्ञानवश भिन्न-सा लगता है । परब्रह्मरूपी सर्ग का जगत्‌ के रूप से जो स्फुरण हुआ है, यह अकारण है, इसलिए वह ब्रह्मरूपी मणि से भिन्न नहीं हे