Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verses 31–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
नास्तमेति न चोदेति क्वचित्किंचित्कदाचन ।
सर्वं शान्तमजं ब्रह्म चिद्धनं सुशिलाघनम् ॥ ३१ ॥
पराणुं प्रति सर्गौघाश्चिताद्भान्तिसहस्रशः ।
तेष्वप्यणावणावन्तः कैवात्रावासना कथम् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि यह जगत् अकारण ही है, तब तो उत्पन्न ही नहीं हुआ, फिर उसका अनुभव कैसे
होता है ?
वासना, चित्त, जीव आदि का अनुभव उत्पन्न हुआ है।
शंका - उसके उदय न होने का क्या उपाय है ?
समाधान- मन का नाश होने से वह उदित नहीं होता यानी मनोनाश ही उसके अनुदयका
हेतु है।
शंका-मनोनाश कैसे होता है ?
समाधान- मनोनाश ज्ञानयोग मेँ दृढ़ अभ्यासरूप पुरुषप्रयत्न से होता है ॥ ३ ०॥ कोई भी
वस्तु कहीं भी और कभी भी न तो पैदा होती है और न नष्ट होती है । सब शान्त अविनाशी
चिद्घन शिला के समान ठोस ब्रह्म ही है, इस श्लोक से अभिनयपूर्वक ज्ञानयोग का आकार
दर्शाया