Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
यथा जलान्त ऊर्म्याद्या गुप्तागुसाश्च शक्तयः ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ताद्यास्तथा जीवेऽन्तरास्थिताः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक चित्त रहेगा, तब तक परमाणु के पेट में भी सृष्टि की परम्परा का निवारण नहीं
किया जा सकता, ऐसा कहते हैं।
परमाणु में चित्त से भ्रान्तिमय हजारों सृष्टियों के समूह के समूह उत्पन्न होते हैं, उनमें भी
प्रत्येक परमाणु में सृष्टियाँ होती हैं, पर परमाणु के अन्दर सृष्टियों के समूह की समावेशपूर्वक
स्थिति कैसे हो सकती है ? यानी परमाणु के अन्दर सृष्टियों के समूह की स्थिति असंभव है।
वह कभी किसी प्रकार भी युक्त नहीं है, अतः मिथ्या ही है, यह अर्थ है ॥ ३ २॥
अनिर्वचनीय मायाशक्ति के रूप से स्थिति तो तरंग आदि दृष्टान्त में भी समान है, ऐसा
कहते हैं।
जैसे जल के भीतर तरंग आदि गुप्त और अगुप्त रहते हैं, वैसे ही जीव में जाग्रत्, स्वप्न,
सुषुप्ति आदि शक्तियाँ भीतर स्थित हैं