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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

एष एव जगद्रूपं जगद्रूपं तु नेश्वरे । हेमैव कटकादित्वं कटकत्वं न हेमनि ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत्‌ के चित्‌ से अभिन्न होने पर भी यदि कोई प्रश्न करे कि कारण के बिना जगत्‌ कैसे उत्पन्न हुआ उसके उत्तर में यही कहना होगा कि जैसे कटक आदि का कनक कारण है, वैसे ही जगत्‌ का कारण चित्‌ है, इस शंका पर कहते हैं। ईश्वर (चित्‌) ही जगद्‌-रूप हुआ है, यह जगत्‌ ईश्वर का विवर्तं है । यदि जगत्‌ का ईश्वर से भेद होता, तो ईश्वर उसके प्रति कारण नहीं हो सकता, यह भाव है। शंका ~ तो क्या जगद्रूप ही ब्रह्म है। समाधान - नहीं, ईश्वर में जगद्रूप ही नहीं है । भाव यह कि विवर्तं की पृथक्‌ सत्ता नहीं होती | इसी प्रकार कटक कुण्डल आदि भी सुवर्णात्मक ब्रह्म के विवर्त ही हैँ, सुवर्ण मे कटक आदि पृथक्‌ नहीं हैं, क्योकि विवर्तकी पृथक्‌ सत्ता नहीं होती, यह ऊपर कहा गया हे