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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

यथावयविनो रूपमनेकावयवात्मकम् । तथाऽनवयवायास्तु चितः सर्वात्मकं च यत् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि एक की अनेकात्सता मे विरोध होगा, तो उस पर समानसत्तावाले अनेक अवयवो के साथ एक अवयवी का समानसत्तावाला तादात्सय लोक में जब विरुद्ध नहीं है, तब कल्पित (न कि वास्तविक) अनेकों से वास्तविक ब्रह्मक्य अविरुद्ध है, इसमें तो कहना ही क्या ? इस आशय से कहते है । जैसे अनेक अवयवो का समुदायभूत अवयवी का रूप लोक में अविरुद्ध है, वैसे ही अनवयवभूत यानी नित्य चित्‌ की एकात्मता कल्पित अनेक रूपों से अविरुद्ध है । एकात्मा होने पर सबको सर्वात्मता का लाभ होने से अनेकता हट जाती है, इससे भी विरोध का अभाव ही है