Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यत्तुल्यकालमखिलं तन्मात्रावेदनं परे ।
अन्तस्थं तदिदं भाति जगदित्यहमित्यपि ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
तो सबके अनुभव से सिद्ध जगत्” ओर 'अहम्” ऐसी भेदप्रतीति कैसे होती है ? इस पर
कहते हैं।
सब प्राणियों में अन्दर स्थित समानकालिक जो ब्रह्मस्वरूपमात्र का अज्ञान है, वही परम
ब्रह्म में "जगत्" और “अहम्” इस प्रकार भेद से प्रतीत होता है यानी यह भेदप्रतीति
अज्ञानकल्पित है, वास्तविक नहीं है