Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 62, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
देहे यथाङ्गिनोऽङ्गादि दृश्यते चित्स्वभावतः ।
ब्रह्मणा पद्मजत्वेन नियत्याद्यङ्गकं तथा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अंगी देह में अंगों को देखता
है, वैसे ही हिरण्यगर्भ चित्स्वभाव होने के कारण नियति, आदिसृष्टि आदिरूप अंगों को देखता
है