Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 62, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
पाषाणोदरलेखौघन्यायेनात्मनि तिष्ठता ।
ब्रह्मणा नियतिः सर्गो बुद्धोऽबोधवतेव खम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि हिरण्यगर्भ ने इस नियति को कैसे जाना, जिससे कि उन्होने नियति के
अनुसार ही सृष्टि की ? इस पर कहते है ।
जैसे स्फटिकशिला के अन्दर प्रतिबिम्बित वनपंक्तियाँ रहती हैं, वैसे ही मायाशबल ब्रह्म
में स्थित हिरण्यगर्भ ने जैसे सोया हुआ पुरुष अपने में स्वाप्नकल्पना के आधार आकाश को
देखता है, वैसे ही नियतिरूपी भावी सृष्टि को देखा