Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 62, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अचलं चलवद्दृष्टं ब्रह्मापूर्य व्यवस्थितः ।
अनादिमध्यपर्यन्तं सर्गो वृक्ष इवाम्बरे ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि ब्रह्म अचल है और सृष्टि चंचल है, इसलिए उन दोनों की एकता
कैसे हो सकती है ? उस पर कहते हैं।
जैसे आकाश में वृक्ष आकाश को पूर्ण करके स्थित है, वैसे ही यह सृष्टि आदि, मध्य
ओर अन्तरहित तथा अचल ब्रह्म को पूर्ण करके स्थित है, अज्ञ की दृष्टि से चल के सदृश
दिखाई देती है