Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 63, Verses 4–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 63, verses 4–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 63 · श्लोक 4-6
संस्कृत श्लोक
सर्वशक्तेर्हि या यैव यथोदेति तथैव सा ॥ ४ ॥
तदास्ति शक्तिर्नानारूपिणी सा स्वभावत इमाः शक्तयोऽयमात्मेति ॥ ५ ॥
एवं विकल्पजालं व्यवहारार्थं धीमद्भिः परिकल्पितं लोके नत्वात्मनि विद्यते भेदः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
शक्तियो के आर्विभाव के अनुरूप ही इसकी विचित्ररूप से स्थिति है, ऐसा कहते हैं।
सर्वशक्तिमान् परमात्मा से जो जो शक्ति जैसे उदित होती है वह वैसे ही स्थित है । तब
वह शक्ति स्वभाव से ही नाना प्रकार के रूपवाली होती है।
शंका- यह शक्ति ओर शक्तिमान् के भेद की कल्पना व्यवहारद्गष्टि से ही है या परमार्थरूप
से भी है ?
समाधान - शक्ति ओर शक्तिमान् के भेद की कल्पना व्यवहारदृष्टि से ही है परमार्थदृष्टि
से नहीं । परमार्थदृष्टि से तो ये शक्तियाँ आत्मरूप हैं। बुद्धिमानों ने लौकिक व्यवहारकी सिद्धि
के लिए इस प्रकार भेद की कल्पना कर रक्खी है, आत्मा मे तनिक भी भेद नहीं है