Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 64, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
क्रोडीकृताङ्कुरं पूर्वं जीवो धत्ते स्वजीवितम् ।
पश्चान्नानात्वमायाति पत्राङ्कुरफलक्रमैः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
पीछे होनेवाले कर्म पहले जीव में बीज में अंकुर के तुल्य वासना रूप से स्थित का ही
आविष्कार करते हैं, किसी अपूर्व का आविष्कार नहीं करते हैं, इस आशय से कहते हैं।
जैसे बीज में स्थित जीव अपने जीवित को, जिसने सूक्ष्मरूप से पहले अपने अन्दर अंकुर
को धारण कर रक्खा है, धारण करता है, पीछे अंकुर, पत्ते, तना, शाखा, टहनियाँ, पल्लव,
पुष्प और फल के क्रम से नानात्व को प्राप्त होता है, वैसे ही हिरण्यगर्भ जीव अनेकता को प्राप्त
होता है