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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 65, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । परस्मात्कारणादेव मनः प्रथममुत्थितम् । मननात्मकमाभोगि तत्स्थमेव स्थितिं गतम् ॥ १ ॥ भावाभावलसद्दोलं तेनायमवलोक्यते । सर्गः सदसदाभासः पूर्वगन्ध इवेच्छया ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण कल्पनाएँ चित्‌ से अतिरिक्त नहीं है, यह कहने के लिए मूलभूत मन की उत्पत्ति और स्थिति कारणसत्तारूप होने से कारणमात्ररूप ही है, ऐसा कहते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, परमकारण से ही मन पहले उत्पन्न हुआ है, वह मनन स्वभाववाला है । जो कुछ भोग्य पदार्थ हैं, वे सब तदात्मक यानी मनोमय हैं । जो कोई दृश्य पदार्थ हैं, वे मन में ही स्थित हैं, वह मन भी परमकारण में स्थित हैं, यह इस प्रकार होता है और यह इस प्रकार नहीं होता, इस प्रकार के भाव और अभाव के विषय में वह झूले के समान दायें और बायें घूमता हे । जैसे पहले अनुभव में आई हुई सुगन्ध स्मरण करने पर वहाँ पर विद्यमान न होने पर भी मनोरथ से देखी जाती है, वैसे ही उस मन से सत्‌ ओर असत्‌ के तुल्य प्रतीत होनेवाली यह सृष्टि देखी जाती है

सर्ग सन्दर्भ

चौसठवाँ सर्ग समाप्त पैंसठवाँ सर्ग मन का, भोग्यसमुदायका और भोक्ता के मूल का तत्त्व चिन्मात्रशेष है, यह प्रदर्शन ।