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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 65, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

न कश्चिद्विद्यते भेदो द्वैतैक्यकलनात्मकः । ब्रह्मजीवमनोमायाकर्तृकर्मजगद्दृशाम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

मन ही जब भेददर्शन को कराता है तब मन के हट जानेपर केवल एक आत्मा के प्रतिष्ठित रहने से मन से कल्पित भेद भी हट जाता है, ऐसा कहते हैं। मन के हट जाने पर ब्रह्म, जीव, मन, माया, कर्ता, कर्म, और जगत्‌ की प्रतीतियों का कोई भेद नहीं रहता, केवल सब द्वैतों के एकमात्र आश्रय परमात्मा स्थित रहते हैं