Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 65, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
द्वैतं यथा नास्ति चिदात्मजीवयोस्तथैव भेदोऽस्ति न जीवचित्तयोः ।
यथैव भेदोऽस्ति न जीवचित्तयोस्तथैव भेदोऽस्ति न देहकर्मणोः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
यह सारी-की सारी अनर्थपरम्परा जीव और ब्रह्म में भेदभ्रम से उत्पन्न हुई है, उन दोनों
की एकता के बोध से उक्त भरम के बाधित होने पर बाधित हो जाती है, इस अभिप्राय से भेद
का निषेध करते हैं।
चिदात्मा (ब्रह्म) और जीव में जैसे भेद नहीं हे, वैसे ही जीव और चित्त में भी भेद नहीं है,
जैसे ही जीव और चित्त में भेद नहीं है, वैसे ही देह और कर्म में भी भेद नहीं हे