Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 65, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
कर्मैव देहो ननु देह एव चित्तं तदेवाहमितीह जीवः ।
स जीव एवेश्वरचित्स आत्मा सर्वः शिवस्त्वेकपदोक्तमेतत् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण शास्त्रों के विचाररहस्य को एक उक्ति से सक्षेपतः कहते है ।
वस्तुतः कर्म ही देह है, कर्म से भिन्नसत्ताविशिष्ट देह नहीं है, और देह ही चित्त है, वह
चित्त ही अहंकार विशिष्ट जीव है, वह जीव ही ईश्वरचैतन्य है, वह आत्मा मंगल ओर सर्वात्मक
है, यह सब एक पद से कहा गया है