Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 66, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
स्वभावाद्व्यतिरिक्तं तु न चित्तस्यास्ति चेतनम् ।
स्पन्दादृते यथा वायोरन्तः किं नाम चेत्यते ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
चेतन चित्त के व्यापारस्वभावसे अतिरिक्त नहीं है, वह समाधि तथा ज्ञानके अभ्यास से
भले ही उपरत हो जाय, किन्तु चित्त कहाँ उपरत हुआ ? यानी अनुपरत ही रहा, ऐसी शंका पर
कहते हैं।
चेतन चित्त के स्वभाव से अतिरिक्त नहीं है, जैसे कि स्पन्द को छोड़कर वायु का दूसरा
स्वभाव नहीं है। जैसे उष्णता के हट जाने पर अग्नि शान्त हो जाती है, वैसे ही व्यापार के नष्ट
हो जाने पर चित्त अवशिष्ट नहीं रहता, क्योंकि चेतनव्यापार के सिवा चित्त के अन्दर किसी
दूसरे स्वरूप का कोई अनुभव नहीं करता