Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 66, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
चेत्यत्वं संभवत्येवं किंचिद्यच्चेत्यते चिता ।
रज्जुसर्पभ्रमाभासं तमविद्याभ्रमं विदुः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
चित् से जिस किसीका अनुभव होता है, वह चेत्य हे, रज्जु में सर्पभ्रम के तुल्य प्रतीत
होनेवाले उसे अविद्याभ्रम कहते हैं