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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verses 18–19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 66, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

संविन्मात्रचिकित्स्येऽस्मिन्व्याधौ संसारनामनि । चित्तमात्रपरिस्पन्दे संरम्भो न च किंचन ॥ १८ ॥ यदि सर्वं परित्यज्य तिष्ठस्युत्क्रान्तवासनः । अमुनैव निमेषेण तन्मुक्तोऽसि न संशयः ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

इस संसारनामक व्याधिका केवल ज्ञानमात्र से प्रतीकार हो सकता हे, यह चित्तका एक व्यापारमात्र हे, इसमें किसी प्रकारका आयास नहीं हे । यदि आप सबका परित्याग कर वासनामय चित्त से रहित होकर स्थित हों, तो एक ही पलक में मुक्त हो जायेंगे, उसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है