Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 66, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
यथा रज्ज्वां भुजङ्गाभा विनश्यत्येव वीक्षणात् ।
संविन्मात्रविवर्तेन नश्यत्येव हि संसृतिः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सम्यग्-दर्शन से
रज्जु में सर्पभ्रम निवृत्त हो जाता है, वैसे ही प्रत्यक्मुख होकर स्वतत्त्वदर्शन से यह संसार नष्ट
हो ही जाता है