Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 66, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
यथा मदवशाद्भ्रान्तान्क्षीबः पश्यति पादपान् ।
तथा चेतनविक्षुब्धान्संसारांश्चित्प्रपश्यति ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे शराब आदि के नशे में
मस्त हुआ पुरूष नशे के कारण वृक्षों को घूमते हुए देखता है, वैसे ही जीवचिति चित्त से
विक्षुब्ध (कल्पित) संसारों को देखती है