Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 66, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यथा द्वित्वं शशाङ्कादौ पश्यत्यक्षिमलाविलम् ।
चिच्चेतनकलाक्रान्ता तथैव परमात्मनि ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मल से कलुषित नेत्र एक
चन्द्र में द्वित्व देखता है, वैसे ही चित्तकी कला यानी भ्रान्तिजननशक्तिसे आक्रान्त यानी
पराधीन की गई जीवचिति परमात्मामें द्वित्वको देखती है