Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
अजातमप्यसद्रूपं पश्यतीदं मनोभ्रमः ।
जातः स्थितोमृतोऽस्मीति भ्रमार्तः पत्तनं यथा ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार भेद के मिथ्या होने पर भी जो जन्म आदि भेदज्ञान होता है, वह मन का भ्रम ही
है, ऐसा कहते हैं।
न तो यह नानात्व (भेद) अभी उत्पन्न हुआ है और न इसका स्वरूप ही सत् है तथापि
मनका भ्रम इसे देखता है, जैसे भ्रम से पीड़ित पुरूष धूमते हुए नगर के पतन का अनुभव करता
है, वैसे ही मनोभ्रम में भी मैं उत्पन्न हुआ, स्थित रहा, मरा इस प्रकार अनुभव करता है