Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अहंममेत्यसद्रूपमेव चेतः प्रपश्यति ।
अदृष्टपरमार्थत्वादाशाविवशसंस्थिति ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जितने भेदज्ञान हैं, उनका मूल अहम्, मम” यह भेदकल्पना ही है, उसके भी परमात्मा के
स्वरूपका अज्ञान ओर भोग की आशाका संस्कार क्रम से मूल हैं, इस अभिप्राय से कहते हैं।
परमार्थ वस्तु का दर्शन न होने के कारण विवश हुआ चित्त “अहम्, मम” इत्यादिरूप
संसार को देखता है, जो असद्रूप ही है