Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
यथा शून्ये दृशः स्फारान्मुक्तावल्यादिदर्शनम् ।
यथा स्वप्ने भ्रमश्चैव तथा चित्तस्य संसृतिः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
मन से कल्पित वस्तु मनयूबों से बनी हूर वस्तु के समान मिथ्या ही है, ऐसा कहते है ।
जैसे आकाश में दृष्टि के विस्तार से मोतियोँ की मालाओं का दर्शन होता है ओर जैसे
स्वप्न में नगर आदि का भ्रम होता है, वैसे ही यह चित्त से कल्पित संसार भ्रम ही हे