Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
स्वतोबीजफला विप्रुड् यथा बीजं पुनर्भवेत् ।
तथा चिच्चेत्यचित्तादि त्यक्त्वा स्वस्था न तिष्ठति ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि किसीको शंका हो कि प्रलयकाल मे सबका लय होने पर विति सदा वैसी ही स्वस्थ
क्यो नहीं रहती, तो इस पर कहते है ।
स्वर्गप्राप्ति के लिए किये गये पुण्य कर्म का स्वर्ग में भोग कर चुकने पर उसमें से जो
अवशिष्ट अंश रह जाता हे, वह अनुशय हे । जैसे उक्त अनुशयवाले जीव से युक्त वृष्टि का
जलबिन्दु वृक्ष, धान, गेहूँ के पेड़-पौधों में प्रविष्ट होकर फिर बीज होता ही है, उदासीन
(बीज होने से विरत) नहीं होता, वैसे ही जीव की वासना से वासित चिति भी चेत्य, चित्त
आदि की सृष्टि के रूप से फिर होती ही है, उसे छोडकर स्वस्थ नहीं होती