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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verses 32–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 32,33

संस्कृत श्लोक

यद्यप्यबोधे बोधे वा बीजान्तस्तरुबीजयोः । इयान्भेदोऽस्ति न जगद्ब्रह्मणोरपि चित्तयोः ॥ ३२ ॥ तथापि व्यज्यते बोधे सत्यात्मकमखण्डितम् । रूपश्रीरिव दीपेन चिन्मात्रालोकरूपि यत् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि जैसे बीज में सूक्ष्मरूप से स्थित वृक्षका ओर उसके बीज का बोध हो चाहे न हो, पर उसमें जो वृक्षजननशक्ति है, वह नष्ट नहीं होती वैसे ही चित्तात्मता को प्राप्त हए जगत्‌ ओर ब्रह्म का भी तत्वतः बोध हो चाहे न हो कोई अन्तर न होगा, ऐसी परिस्थिति में बोध की विफलता होगी, इस पर कहते है । यद्यपि वृक्ष तथा बीज का बोध हो अथवा न हो, परन्तु सूक्ष्मरूप से बीज के मध्य में स्थित जो वृक्ष और बीज हैं, उनकी वृक्षजननशक्ति नष्ट नहीं होती है, यह भेद प्रत्यक्ष दिखलाई देता है तथापि चित्तभूत जगत्‌ और ब्रह्म में यह बात है ही नहीं यानी चित्तभूत जगत्‌ और ब्रह्म का वास्तविक बोध हो जानेपर वृक्ष और बीज के समान उनमें सृष्टिजननशक्ति नहीं रहती है । क्योंकि बीज और वृक्ष के बोधमात्र से वास्तविक अखण्डित स्वरूप व्यक्त नहीं होता, ब्रह्मबोध से तो दीपक से रूपशोभा के समान वह चिन्मात्र के आलोक से दिखाई देनेवाला तत्त्व व्यक्त हो जाता है, यानी और बातों में समानता होने पर भी उन दोनों में इतनी विलक्षणता है