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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

स्वभावात्कारणं द्वित्वं पूर्वसंकल्पचित्स्वयम् । नानाकारणतां पश्चाद्याति जन्ममृतिस्थितेः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने में स्वाभाविक द्वितीयता (भेद) ही आगे होनेवाले संसार की प्रवृत्तिका मुख्य कारण है, पहले-पहले के संकल्पों की वासनाओं से युक्त जीवचैतन्य तो केवल पीछे होनेवाली विचित्रता का कारण है, ऐसा कहते हैं। आत्मा में स्वाभाविक द्वितीयता संसार का मुख्य कारण है, पूर्व पूर्व संकल्पों की वासनाओं से वासित जीवचिति तो पीछे जन्म, मरण आदि नाना भावों की कारण होती है