Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
अहं किमिति शब्दार्थवेदनाभोगसंविदम् ।
संविदं तत्त्वशब्दार्थं जीवः पश्यति सार्थकम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें पहले शब्द और अर्थ के विभाग की स्फूर्ति से मोहाक्रान्त अहन्ताध्यास ओर तदनन्तर
संसारतत्त्वस्मरण होता है, ऐसा कहते हैं।
जीव 'मैं क्या हू, यों तात्त्विक रूप से या मनुष्य आदि के आकाररूप से विशेषतया ज्ञान
को प्राप्त नहीं होता है, मोहाक्रान्त संवित् को पहले देखता है, तदुपरान्त पुरुषार्थविचार के
साथ हजारों पूर्व जन्मों के स्मरण से गर्भ में जगत् और तत्त्वशब्द के अर्थ को तथा ज्ञान को
देखता है