Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
मातृमेयप्रमाणादि यदा ब्रह्मैव वेदनात् ।
तदातिवाहिकोक्तीनां कः प्रसङ्गस्तदेव तत् ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
जब ब्रह्म के परिज्ञान से प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि ब्रह्मस्वरूप
ही हैं, तब आतिवाहिक देहों की उक्तिका क्या प्रसंग है ? यानी वे तो ब्रह्मस्वरूप हैं ही। भाव
यह है कि आतिवाहिक देहादि द्वारा अध्यारोप और अपवाद की कल्पना भी व्युत्पत्याधायक
व्यवहारद्ष्टि से ही है, परमार्थदृष्टि से नहीं है