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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

अन्यत्ववेदनादन्यः परस्मादातिवाहिकः । ब्रह्मत्ववेदनाद्ब्रह्म सा संवित्तिर्हि नान्यजा ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

भेदज्ञान से आतिवाहिक ब्रह्म से अन्य प्रतीत होता है और ब्रह्मत्वज्ञान से तो वह आतिवाहिक ब्रह्म ही है। यदि ज्ञानानुसार ही वस्तु की सिद्धि है तो ब्रह्मत्वज्ञान ओर अन्यत्वज्ञान में विशेष क्या हुआ ? तो इस पर कहते हैं ? ब्रह्मत्वज्ञानरूप संवित्‌ भ्रान्तिजन्य नहीं है, अत: ब्रह्मत्वज्ञान प्रमात्मक है और अन्यत्वज्ञान भ्रमात्मक हे