Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
असंभवादसंवित्तेर्ब्रह्मात्मैकतयाथवा ।
को मोक्षः को विचारश्चेत्यलं भेदविकल्पनैः ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसा है, तो चिदेकरस ब्रह्म में अज्ञान का सम्पर्क न होने से अज्ञान न होने के कारण
जीवभेद की कल्पना ही नहीं होगी अथवा ब्रह्मैकत्व ही स्वतःसिद्ध होगा, अपने से अतिरिक्त
मोक्षरूप फ़ल और उसके प्रापक विचार का संभव ही नहीं है, तो प्रवृत्ति कैसे होगी ? ऐसी
श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, अज्ञान का असम्भव होने से अथवा ब्रह्मात्मैकता की
स्वतःसिद्धि होने से क्या मोक्ष हे ओर क्या विचार है ? इसलिए भेदकल्पनाएँ विफल हैं