Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
चित्त्वं चित्तं भावितं सत्स्पन्द इत्युच्यते बुधैः ।
दृश्यत्वभावितं चैतदस्पन्दनमिति स्मृतम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त दो प्रकार के चिन्मात्रों में से प्रथम यानी स्पन्दस्वभाव (रजोगुणप्रधान माया से
उपहित) चित् का विवरण करते हैं।
चित् द्वारा अपने स्वाभाविक चित्त्व की ही अविद्यावश यदि विषय के आकार में कल्पना
(भावना) की जाय, तो चित्ताकार (विषयाकार) बना हुआ अपना स्वाभाविक चित्तव ही विद्वानों
द्वारा स्पन्द कहलाता है, यदि चिति अपने स्वाभाविक चित्त्वकी दृश्यत्वरूप से भावना नहीं
करती है, तो उक्त स्वाभाविक चित्त्व अस्पन्द कहलाता है