Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 71
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 71
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणः सुकृतात्पापात्कीटकस्य समुत्थितेः ।
चित्तन्मात्रात्मिका भ्रान्तिः प्रेक्षामात्रं भवेत्क्षयः ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
उन दो में युकृतरूप सार के उत्कर्षे की चरम सीमा का फल ब्रह्मता (ब्रह्मा का पद) है,
और दुष्कृतरूप सार के उत्कर्ष की चरम सीमा का फल कीटता (कीडे का पद) है, इस प्रकार
वैचित्र्य के कारण भिन्न होने पर भी दोनों में अज्ञानचिन्मात्रप्रयुक्त जो द्वैत- भ्रान्ति है और
ज्ञानमात्र से उसका विनाश होता है, ये दोनों में समान ही हैं, ऐसा कहते है ।
ब्रह्मा का पुण्य से आविर्भाव होता है, और कीड़े का पाप से । चिन्मात्र के अज्ञान से भ्रान्ति
होती है और उसके ज्ञान से भ्रान्ति का क्षय हो जाता है