Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 72
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 72 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 72
संस्कृत श्लोक
मातृमानप्रमेयाणि न चिन्मात्रेतरद्यतः ।
ततो द्वैतैक्यवादार्थः शशशृङ्गाज्जिनीसमः ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि जब तक प्रमाता प्रमाण से प्रमेयरूप द्वैत का अनुभव करता है, तब
तक द्वैत है ओर उसके नष्ट होने पर ऐक्य ही है, इस प्रकार सबका क्रमशः द्वैत और
टरक्यस्वभावत्व ही वास्तविक क्यो न मान लिया जाय, इस पर कहते हैं।
द्वित मातृ (प्रमाता) ओर मान (प्रमाण) से प्रमेय नहीं हे, क्योंकि मातृ, मान आदिरूप द्वैत
को भी अन्य मातृ, मान आदि की अपेक्षा होने के कारण अनवस्थापत्ति हो जायेगी । मातृ, मान
आदिकी चिन्मात्रता होने पर द्वैत ओर एेक्य के साधक अन्य का अभाव होने से द्वैत और
एेक्यवाद खरगोश के सींग ओर आकाशकुसुम के तुल्य हैं