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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verses 15–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 7, verses 15–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यदेतच्चेतनं जीवो विशीर्णो जन्मजङ्गले । एतमात्मानमिच्छन्ति ये तेऽज्ञाः पण्डिता अपि ॥ १५ ॥ जीव एव हि संसारश्चेतना दुःखसंततिः । अस्मिञ्ज्ञाते न विज्ञातं किंचिद्भवति कुत्रचित् ॥ १६ ॥ ज्ञायते परमात्मा चेद्राम दुःखस्य संततिः । क्षयमेति विषावेशशान्ताविव विषूचिका ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

आपका यह कथन ठीक होता, यदि जीव ही संसारी होता और जीव ही अपने ज्ञान से मुक्त होता अथवा जीव ही तात्तिक आत्मा होता, किन्तु यह बात तो है नही, क्योंकि ऐसा मानने से (्रह्म वा इदमग्र आसीत्‌ तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्‌” (यह सव पहले ब्रह्म ही था, मैं ब्रह्म हूँ यों ब्रह्म ने अपने को ही जाना, इससे वह सव हो गया) इस श्रुति में ब्रह्म को ही अपने अज्ञान से संसार होता है और अपने ज्ञान से मुक्ति होती है, इस कथन से विरोध होता है और “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा इससे प्रतिपादित अन्य चेतन के निषेधसे विरोध होता है । जब ब्रह्म ही “अनेन जीवेनात्मना“ इत्यादि श्रुति से इदंकारका आस्पद और कल्पित होने से अनात्मभूत, संसारकोटि में प्रविष्ट तथा भ्रम से आत्मरूपसे गृहीत जीवरूप से उसके धर्मों द्वारा मैं जीव हूँ" ऐसा मानता हुआ संसार को प्राप्त होता है, तब जीवकी ही संसारिता फलित होती है। ऐसी अवस्थामें जीवका बाध होने पर भी वरघातन्यायकी प्राप्तिरूप दोष नहीं होता, ऐसा अपने मनमें रखकर पहले जो स्वयं कहा था, उसीको दढ कर रहे श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीराम, जो यह चेतन जीव विविधशरीररूपी जंगल में पतित और विशीर्ण है, इसे जो लोग आत्मा समझते हैं, वे लोग पण्डित (शास्त्रीय प्रज्ञासे सम्पन्न) होते हुए भी अज्ञानी हैं । हे राघव, जीव ही संसारी है ओर उसीको दुःखपरम्पराओं का अनुभव होता है, अतएव जीव के ज्ञात होने पर कहीं पर कुछ ज्ञात नहीं होता । यदि परमात्मा का ज्ञान हो जाता है, तो जैसे विष के वेग के शान्त होने पर विषूचिका शान्त हो जाती है, वैसे ही दुःखपरम्परा भी नष्ट हो जाती है